JNM पत्रकार हरदीप जम्वाल | जम्मू
जम्मू-कश्मीर में मस्जिदों में शुक्रवार की नमाज के दौरान दिए जाने वाले खुतबों यानी धार्मिक उपदेशों को लेकर एक नई पहल की तैयारी की जा रही है। जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड अपने अधीन आने वाली मस्जिदों में जुमे के खुतबों के लिए साझा विषय निर्धारित करने पर विचार कर रहा है। इसके लिए धार्मिक विद्वानों की एक समिति बनाने का प्रस्ताव है, जो समसामयिक सामाजिक मुद्दों को ध्यान में रखते हुए उपदेशों के विषय तय करेगी।
इस पहल का उद्देश्य धार्मिक मंचों के माध्यम से समाज में जागरूकता बढ़ाना, युवाओं को नशे जैसी समस्याओं से दूर रहने के लिए प्रेरित करना और महिलाओं से जुड़े मुद्दों, नैतिक मूल्यों तथा सामाजिक जिम्मेदारियों पर चर्चा को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही धार्मिक मंचों के जिम्मेदार इस्तेमाल और हिंसा व कट्टरपंथ के विरुद्ध सकारात्मक संदेश देने पर भी जोर दिया जा रहा है।
धार्मिक विद्वानों की समिति तय करेगी विषय
वक्फ बोर्ड के कार्यकारी अधिकारी इश्तियाक मोहि-उद-दीन ने विभिन्न जिलों के धार्मिक उपदेशकों के साथ ऑनलाइन बैठक में इस प्रस्ताव पर चर्चा की। बैठक के दौरान वक्फ बोर्ड के दायरे से बाहर आने वाली मस्जिदों को भी इस पहल से जोड़ने के संबंध में सुझाव मांगे गए।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत धार्मिक विद्वानों की समिति समसामयिक विषयों का चयन करेगी। हालांकि, अभी समिति के गठन, उसके अधिकारों और इस व्यवस्था को लागू करने की प्रक्रिया से जुड़े कई पहलुओं को स्पष्ट किया जाना बाकी है।
वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष डॉ. सैयद दरख्शां अंद्राबी के अनुसार, पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं से संबंधित पारंपरिक उपदेशों में बदलाव नहीं किया जाएगा। उनका कहना है कि पहल का उद्देश्य समसामयिक मुद्दों पर इमामों और खतीबों के बीच समन्वय स्थापित करना है। विषयों के चयन में बोर्ड अध्यक्ष या अधिकारियों की सीधी भूमिका के बजाय धार्मिक विद्वानों की समिति की भूमिका प्रस्तावित है।
यह भी स्पष्ट किया गया है कि साझा विषय तय करने का अर्थ यह जरूरी नहीं है कि हर मस्जिद में पूरा खुतबा शब्दशः एक जैसा पढ़ा जाएगा। इस व्यवस्था में स्थानीय परिस्थितियों और धार्मिक उपदेशकों की भूमिका को किस प्रकार स्थान दिया जाएगा, यह महत्वपूर्ण होगा।
नशा, महिलाओं के मुद्दे और सामाजिक जिम्मेदारियों पर चर्चा
जम्मू-कश्मीर में नशे की समस्या, युवाओं के सामने आने वाली चुनौतियों और सामाजिक बुराइयों को देखते हुए मस्जिदों के माध्यम से जागरूकता फैलाने की संभावनाओं पर जोर दिया जा रहा है। धार्मिक उपदेशों में नशे से होने वाले नुकसान, परिवार के प्रति जिम्मेदारियों, महिलाओं के सम्मान, शिक्षा और सामाजिक सौहार्द जैसे विषयों को शामिल किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक संस्थान केवल इबादत के केंद्र ही नहीं, बल्कि सामुदायिक सहयोग और सामाजिक संवाद के महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। यदि इन मंचों से युवाओं को शिक्षा, रोजगार, रचनात्मक गतिविधियों और शांतिपूर्ण सामाजिक भागीदारी के लिए प्रेरित किया जाता है, तो इसका समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
धार्मिक मंचों के इस्तेमाल पर भी उठते रहे हैं सवाल
कश्मीर के राजनीतिक इतिहास में मस्जिदों और धार्मिक मंचों की भूमिका समय-समय पर चर्चा का विषय रही है। वर्ष 2019 से पहले के विभिन्न राजनीतिक घटनाक्रमों, अलगाववादी गतिविधियों और हिंसक प्रदर्शनों के दौरान धार्मिक पहचान तथा सामुदायिक नेटवर्क के इस्तेमाल को लेकर आरोप सामने आते रहे हैं।
कश्मीर मामलों के जानकार रमीज मखदूमी और सलीम रेशी ने धार्मिक मंचों के जिम्मेदार इस्तेमाल की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार, अतीत में कुछ स्थानों पर दिए गए संदेशों और अलगाववादी गतिविधियों के बीच संबंधों को लेकर सवाल उठे थे। ऐसे में धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि वह युवाओं को हिंसा से दूर रहने, शिक्षा हासिल करने और समाज की मुख्यधारा में सकारात्मक योगदान देने के लिए प्रेरित करे।
हालांकि, किसी विशेष घटना या संगठन से जुड़े आरोपों के आधार पर सभी मस्जिदों और धार्मिक उपदेशकों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा। युवाओं का कट्टरपंथ या हिंसा की ओर आकर्षित होना कई सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत कारणों से जुड़ा हो सकता है।
सूफी परंपरा और इंसानियत के संदेश पर जोर
कश्मीर के धार्मिक-सामाजिक मामलों के जानकार और अहल-ए-सुन्नत कश्मीर के प्रधान ख्वाजा फारूक अहमद रेंजू शाह ने कहा कि कश्मीर में खुतबों के माध्यम से बुलबुल शाह और शाह-ए-हमदान जैसे सूफी संतों की शिक्षाओं को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
उन्होंने इंसानियत, प्रेम, भाईचारे और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता जैसे मूल्यों को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, धार्मिक उपदेशों में ऐसे संदेशों को स्थान मिलना चाहिए, जो समाज में आपसी सद्भाव को मजबूत करें और लोगों को हिंसा से दूर रहने की प्रेरणा दें।
गैर-वक्फ मस्जिदों को जोड़ना होगी बड़ी चुनौती
प्रस्तावित पहल को लागू करने में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि जम्मू-कश्मीर की सभी मस्जिदें वक्फ बोर्ड के प्रत्यक्ष प्रशासनिक दायरे में नहीं आतीं। ऐसे में इस व्यवस्था को व्यापक स्तर पर स्वीकार्य बनाने के लिए स्थानीय मस्जिद समितियों, इमामों और धार्मिक संगठनों के साथ संवाद करना जरूरी होगा।
इसके अलावा जम्मू संभाग और कश्मीर घाटी की सामाजिक परिस्थितियों तथा स्थानीय जरूरतों में अंतर को ध्यान में रखना भी आवश्यक होगा। साझा विषय तय करते समय स्थानीय समस्याओं और धार्मिक परंपराओं के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखना महत्वपूर्ण रहेगा।
धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन जरूरी
वक्फ बोर्ड की इस प्रस्तावित पहल को लेकर धार्मिक संवाद, सामाजिक सुधार और धार्मिक संस्थानों की भूमिका पर चर्चा तेज होने की संभावना है। जहां एक ओर नशामुक्ति, शिक्षा, महिलाओं के सम्मान और सामाजिक सौहार्द जैसे मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के अवसर दिखाई देते हैं, वहीं दूसरी ओर धार्मिक उपदेशों की स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण हैं।
उड़ी सेक्टर के एक मदरसे के संचालक मौलवी फारूक अहमद बट ने कहा कि प्रस्तावित समिति के गठन और उसके अधिकारों को स्पष्ट करना आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत न हों और धार्मिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप की स्थिति पैदा न हो।
कुल मिलाकर, जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की प्रस्तावित पहल का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि धार्मिक विद्वानों, इमामों, स्थानीय मस्जिद समितियों और समुदाय के बीच कितना प्रभावी संवाद स्थापित हो पाता है। यदि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता, धार्मिक परंपराओं का सम्मान और सामाजिक जरूरतों के बीच संतुलन कायम रखा जाता है, तो मस्जिदों के माध्यम से समाज में सकारात्मक संदेश पहुंचाने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।



