एक समय था जम्मू में छठ पूजा का नाम भी बहुत कम लोग जानते थे। यह पर्व पारंपरिक रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित माना जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं — जम्मू के तालाबों, नालों और घाटों पर आज हजारों दीप जलते हैं, लोकगीत गूंजते हैं और श्रद्धालु सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। छठ पूजा अब सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जम्मू की साझा संस्कृति और एकता का प्रतीक बन गई है।
सूर्य देव और छठी मैया की आराधना
छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का महापर्व है। भक्त इस व्रत के माध्यम से परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्यता और संतान की दीर्घायु की कामना करते हैं। सूर्य देव को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना गया है, जबकि छठी मैया मातृत्व और सुरक्षा की देवी हैं।
पौराणिक कथाएं और मान्यता
छठ पूजा का उल्लेख महाभारत और पुराणों में मिलता है। मान्यता है कि कर्ण प्रतिदिन सूर्य देव की आराधना करते थे, जिससे उन्हें दिव्य कवच-कुंडल प्राप्त हुआ। वहीं द्रौपदी और पांडवों ने भी राज्य पुनः प्राप्त करने के लिए छठ व्रत किया था।
वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व
सूर्य को अर्घ्य देने का यह पर्व स्वास्थ्य और पर्यावरण से भी जुड़ा है। जल में खड़े होकर सूर्य की किरणों को ग्रहण करने से शरीर में विटामिन D का निर्माण होता है, जबकि जलाशयों की सफाई और घाटों की स्वच्छता से पर्यावरण संरक्षण का संदेश फैलता है।
चार दिवसीय अनुशासन और श्रद्धा
छठ पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है —
नहाय-खाय: स्नान कर सात्विक भोजन से व्रत की शुरुआत।
खरना: दूसरे दिन शाम को गुड़-चावल की खीर का प्रसाद।
संध्या अर्घ्य: तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पण।
उषा अर्घ्य: चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन।
जम्मू में कैसे मनाई जाती है छठ पूजा
जम्मू में अब छठ पूजा की भव्यता देखने लायक होती है।
तालाब तिल्लो, त्रिकुटा नगर, बाग-ए-बाहू, गंग्याल, चौकी चौरा और पुरमंडल रोड के घाटों पर हजारों श्रद्धालु एकत्र होकर सूर्य देव की उपासना करते हैं। नगर निगम और स्थानीय समितियां मिलकर घाटों की सफाई, रोशनी और सुरक्षा की विशेष व्यवस्था करती हैं।
महिलाएं पारंपरिक साड़ियों में सूप, ठेकुआ, केला, गन्ना, नारियल और दीपक लेकर घाटों की ओर जाती हैं।
घाटों पर लोकगीतों की गूंज होती है “उग हो सूरज देव अरघ्य के बेर अब देर भइल…”
रातभर जागरण और भक्ति के माहौल से पूरा जम्मू शहर आस्था में डूब जाता है।
एकता और सांस्कृतिक मेल का प्रतीक
जम्मू में छठ पूजा ने उत्तर भारत और डोगरा संस्कृति को जोड़ने वाला सेतु बना दिया है। इस पर्व ने न सिर्फ पूर्वांचली समाज को अपनी परंपरा निभाने का अवसर दिया, बल्कि स्थानीय लोगों को भी इस लोकआस्था से जोड़ा है।
आज यह पर्व बताता है कि भक्ति और संस्कृति की कोई सीमा नहीं होती — जहाँ आस्था होती है, वहाँ परंपरा खुद रास्ता बना लेती है।


