JNM संवाददाता | श्रीनगर
हरदीप जमवाल

दिल्ली में धमाका हुआ — लेकिन एक भी आतंकी संगठन ने जिम्मेदारी नहीं ली।
पहली बार ऐसा हुआ है कि घाटी में सक्रिय आतंकी संगठनों ने चुप्पी को हथियार बना लिया है।
न कोई ऑडियो, न वीडियो, न क्लेम।
यह चुप्पी किसी रणनीति का हिस्सा है, और यह रणनीति डर से पैदा हुई है।
क्यों नहीं ले रहे जिम्मेदारी?
कुछ साल पहले तक आतंकी संगठन हमलों की जिम्मेदारी लेकर खुद को सुर्खियों में रखते थे।
वे दिखाते थे — “हम हैं, हम पहुंच रखते हैं, हम मार सकते हैं।”
लेकिन अब वो दौर खत्म हो रहा है।
सर्जिकल स्ट्राइक (2016), एयर स्ट्राइक (2019) और हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने आतंकियों का दिमाग हिला दिया है।
अब उन्हें डर है —
जिसका नाम सामने आया, सेना उसे पाताल से भी खींच लेगी।
भारत का संदेश साफ
“ऑपरेशन सिंदूर में जो हाल पाकिस्तान का हुआ, उसे देखकर ये आतंकी अब खुलकर जिम्मेदारी लेने की हिम्मत नहीं कर रहे।
भारतीय सेना उन्हें ऐसी सजा देगी, जो उनके आकाओं तक याद रहेगी।”
घाटी में कौन सक्रिय है?
टीआरएफ (द रेजिस्टेंस फ्रंट)
जैश-ए-मोहम्मद
लश्कर-ए-तैयबा
हिजबुल मुजाहिदीन
अल उमर
हुरकत उल मुजाहिदीन
केंद्रीय गृह मंत्रालय 24 से ज्यादा संगठनों पर प्रतिबंध लगा चुका है —
फिर भी जैश और टीआरएफ अभी भी सबसे ज्यादा हमलों की जिम्मेदारी लेने वाले संगठन रहे हैं।
लेकिन दिल्ली में नहीं।
इस बार नहीं।
यह सिर्फ चुप्पी नहीं — यह मौन संदेश है
यह बताता है कि
आतंकी अब अपनी ‘ब्रांड वैल्यू’ नहीं, खुद की ‘बचाव रणनीति’ पर काम कर रहे हैं।
अगर नाम आ गया तो
ड्रोन स्ट्राइक, स्पेशल ऑपरेशन और आर्मी की डायरैक्ट एंट्री का खतरा वास्तविक है।
कश्मीर में हुई अब तक की प्रमुख आतंकी घटनाएं
मार्च 2000 को अनंतनाग के छत्तीसिंहपोरा में सिख समुदाय के 36 लोगों की गोली मारकर हत्या।
अगस्त 2000 में पहलगाम के नुनवान बेस कैंप पर हमला कर स्थानीय लोगों के साथ ही 32 अमरनाथ तीर्थयात्रियों की हत्या।
जुलाई 2001 में अमरनाथ यात्रियों पर शेषनाग बेस कैंप के पास हमला कर 13 लोगों की हत्या की।
2001 में ही श्रीनगर में सचिवालय परिसर में पर आत्मघाती आतंकी हमले में 36 लोगों की जान गई।
2002 में चंदनबाड़ी बेस कैंप पर आतंकी हमले में 11 अमरनाथ तीर्थ यात्री मारे गए।
23 नवंबर 2002 को जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर आईडी विस्फोट में 9 सुरक्षाकर्मी, तीन महिलाएं और दो बच्चों समेत 19 लोगों की मौत।
23 मार्च 2003 को आतंकियों ने पुलवामा के नंदीमार्ग में 11 महिलाओं और 2 बच्चों समेत 24 कश्मीरी पंडितों की हत्या की।
13 जून 2005 को पुलवामा में सरकारी स्कूल के सामने बाजार में विस्फोटक से भरी कार में विस्फोट से 2 स्कूली बच्चों समेत 13 लोग मारे गए थे।
12 जून 2006 को आतंकियों ने कुलगाम में हमला कर 9 नेपाली नागरिक और बिहारी मजदूरोंं की हत्या की।
10 जुलाई 2017 को कुलगाम में अमरनाथ यात्रा पर जा रही बस पर हमला कर 8 लोगों को मार डाला।
14 फरवरी 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों की बस पर आत्मघाती हमले में 40 जवान बलिदान।
9 जून 2024 को शिवखोड़ी में श्रद्धालुओं की बस पर हमला, नौ लोगों की मौत।
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम की बायसरन घाटी में आतंकियों ने 26 पर्यटकों की हत्या कर दी थी।
नया आतंकी फॉर्मूला: हमला करो… लेकिन नाम मत लो
यह पहली बार देखा जा रहा है कि
हमला होने के बावजूद आतंकी चुप हैं।
यह ‘खामोशी का डर’ है।
क्योंकि अब क्लेम करना आत्मघाती साबित हो सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
जांच एजेंसियां इस खामोशी को भी डिकोड कर रही हैं
आतंकी नेटवर्क पर डिजिटल ट्रैकिंग पहले से तेज
पाकिस्तान को भी संदेश —
नए भारत की नीति सरल है — हिट बैक, हिट हार्ड, हिट फास्ट।
ये सिर्फ एक ब्लास्ट नहीं था।
यह आतंकी सोच में बदलाव का सबूत है।
यह भारत की सैन्य क्षमता और नई सुरक्षा नीति की जीत है।
और सबसे ज़रूरी —
जब आतंकी बोलना बंद कर दें, समझिए डर बोल रहा है।

