23 सितंबर 1895 को जम्मू के अमर महल में जन्मे महाराजा हरि सिंह जम्मू-कश्मीर के इतिहास के उन प्रमुख व्यक्तित्वों में शामिल हैं, जिनका जीवन सामाजिक सुधार, शिक्षा, प्रशासन, कृषि और 1947 के ऐतिहासिक घटनाक्रम से गहराई से जुड़ा रहा। उनकी 131वीं जयंती पर उनके जीवन को केवल एक शासक या 1947 की घटनाओं तक सीमित करके नहीं, बल्कि उनके शासनकाल में हुए विभिन्न सुधारों और उस समय की परिस्थितियों के संदर्भ में देखना जरूरी है।
महाराजा हरि सिंह का जन्म 23 सितंबर 1895 को अमर महल, जम्मू में राजा अमर सिंह के घर हुआ था। वे महाराजा प्रताप सिंह के भतीजे थे। बचपन से ही उन्हें राजकाज और सैन्य प्रशिक्षण की शिक्षा मिली। उन्होंने मेयो कॉलेज, अजमेर में अध्ययन किया और बाद में सैन्य प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। महाराजा प्रताप सिंह ने उन्हें राज्य सेना में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं।
23 सितंबर 1925 को महाराजा प्रताप सिंह के निधन के बाद हरि सिंह जम्मू-कश्मीर के शासक बने। उनके शासनकाल का एक प्रमुख पक्ष यह था कि उन्होंने प्रशासन के साथ-साथ शिक्षा और सामाजिक सुधारों पर भी ध्यान दिया। जम्मू विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में उनके शासनकाल की प्रमुख नीतियों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, वन अधिकार और भूमि स्वामित्व से जुड़े सुधारों का उल्लेख किया गया है।
शिक्षा को बनाया बदलाव का आधार
महाराजा हरि सिंह के शासनकाल में शिक्षा के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। 1930 में प्राथमिक शिक्षा को निश्शुल्क और अनिवार्य बनाने की व्यवस्था लागू की गई। शुरुआत में इसके क्रियान्वयन का क्षेत्र सीमित था, लेकिन बाद में इसे अन्य क्षेत्रों तक विस्तारित करने के प्रयास हुए।
शिक्षा का उद्देश्य केवल शहरों तक सीमित नहीं था। ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालय खोलने और पिछड़े तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने पर भी जोर दिया गया। विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति और आर्थिक सहायता देने की व्यवस्थाएं विकसित की गईं।
उनके शासनकाल में शिक्षा व्यवस्था के विस्तार के साथ उच्च और तकनीकी शिक्षा को भी प्रोत्साहन मिला। शिक्षा के क्षेत्र में किए गए इन प्रयासों ने जम्मू-कश्मीर में आधुनिक शिक्षा के विस्तार की नींव को मजबूत करने में भूमिका निभाई।
बेटियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान
उस समय लड़कियों की शिक्षा के सामने सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर अनेक बाधाएं थीं। पर्दा प्रथा, कम उम्र में विवाह और लड़कियों को विद्यालय भेजने को लेकर रूढ़िवादी सोच शिक्षा के रास्ते में बड़ी बाधाएं थीं।
महाराजा हरि सिंह के शासनकाल में महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास हुए। लड़कियों के लिए विद्यालयों का विस्तार किया गया और जहां अलग विद्यालय उपलब्ध नहीं थे, वहां शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर काम हुआ।
1939 में ऐसे क्षेत्रों में, जहां लड़कियों के लिए अलग विद्यालय नहीं थे, कम उम्र की लड़कियों को अभिभावकों की सहमति से लड़कों के विद्यालयों में प्रवेश देने की व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है।
यह उस समय की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए महिला शिक्षा के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास था।
वयस्क शिक्षा की ओर भी कदम
शिक्षा का विस्तार केवल बच्चों तक सीमित नहीं रहा। वयस्कों को साक्षर बनाने के लिए भी अभियान चलाए गए।
‘तालीम-ए-वालिदैन’ जैसे प्रयासों के माध्यम से वयस्कों तक शिक्षा पहुंचाने की कोशिश की गई। पंचायत घरों और अन्य स्थानीय संस्थानों का उपयोग भी शिक्षा के लिए किए जाने का उल्लेख मिलता है।
इसका उद्देश्य यह था कि शिक्षा का लाभ केवल नई पीढ़ी को नहीं, बल्कि उन लोगों को भी मिले जो बचपन में विद्यालय नहीं जा सके थे।
सामाजिक भेदभाव के खिलाफ महत्वपूर्ण फैसले
महाराजा हरि सिंह के शासनकाल के सामाजिक सुधारों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ उठाए गए कदम विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे।
सरकारी संस्थानों, स्कूलों, सार्वजनिक कुओं और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं में वंचित वर्गों के साथ भेदभाव रोकने के निर्देश दिए गए। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए इन वर्गों के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने की व्यवस्था भी की गई।
31 अक्टूबर 1932 को एक महत्वपूर्ण घोषणा के माध्यम से राज्य के मंदिरों में वंचित वर्गों को प्रवेश और पूजा का अधिकार देने की व्यवस्था की गई। इस फैसले का उस समय रूढ़िवादी वर्गों के एक हिस्से ने विरोध किया, लेकिन आदेश को लागू किया गया।
यह फैसला उस समय के सामाजिक वातावरण में महत्वपूर्ण था, क्योंकि मंदिर प्रवेश और सार्वजनिक संसाधनों तक समान पहुंच सामाजिक बराबरी की दिशा में बड़े मुद्दे थे।
महिलाओं से जुड़ी सामाजिक कुरीतियों पर ध्यान
महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए भी उनके शासनकाल में कदम उठाए गए। बाल विवाह और महिलाओं से जुड़ी अन्य सामाजिक समस्याओं को लेकर कानून और संस्थागत प्रयास किए गए।
1927 और 1928 में महिला कल्याण से जुड़े संगठनों की स्थापना का उल्लेख मिलता है। इनका उद्देश्य महिलाओं से संबंधित सामाजिक समस्याओं पर काम करना और उनके कल्याण को बढ़ावा देना था।
विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं की शिक्षा जैसे विषय भी उस दौर के सामाजिक सुधारों का हिस्सा बने।
किसानों को कर्ज से राहत
जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका थी और किसानों के सामने कर्ज तथा साहूकारों की ऊंची ब्याज दरों की समस्या थी।
1926 में कृषक राहत विनियमन लागू किया गया। इसके तहत किसानों को कर्ज के बोझ से राहत देने और ब्याज दरों को नियंत्रित करने की व्यवस्था की गई। जम्मू विश्वविद्यालय के प्रकाशित अध्ययन के अनुसार ब्याज दर को 12 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक सीमित करने का प्रावधान था।
इसका उद्देश्य किसानों को अत्यधिक कर्ज और साहूकारी व्यवस्था के दबाव से राहत देना था।
इसके बाद भूमि और कृषि से जुड़े अन्य कानून भी लागू किए गए। 1933 के भूमि संबंधी प्रावधानों तथा कृषि और भूमि सुधारों के माध्यम से किसानों के हितों की सुरक्षा की दिशा में कदम उठाए गए।
सहकारी व्यवस्था को बढ़ावा
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सहकारी संस्थाओं को भी बढ़ावा दिया गया। किसानों को सामूहिक रूप से ऋण और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए सहकारी व्यवस्था विकसित करने की कोशिश हुई।
इससे ग्रामीण लोगों को साहूकारों पर निर्भरता कम करने और संगठित आर्थिक गतिविधियों की ओर बढ़ने का अवसर मिला।
स्वास्थ्य सेवाओं और जनकल्याण पर ध्यान
महाराजा हरि सिंह के सुधार कार्यक्रम में स्वास्थ्य भी महत्वपूर्ण विषय था। उनके शासनकाल में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और चिकित्सा सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास किए गए।
जम्मू विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक अध्ययन में स्वास्थ्य सेवा को उनके 11 सूत्रीय सुधार एजेंडे के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल किया गया है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि वर्तमान श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल को सीधे उनके शासनकाल की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा, क्योंकि इस अस्पताल की स्थापना 1948 में हुई थी। इसलिए महाराजा के संदर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और उनके शासनकाल की स्वास्थ्य नीतियों की बात करना अधिक तथ्यात्मक है।
प्रशासन और कानून के क्षेत्र में सुधार
महाराजा हरि सिंह के शासनकाल में प्रशासन को अधिक व्यवस्थित और संस्थागत बनाने के प्रयास हुए। कानून के शासन और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
उनके सार्वजनिक जीवन से जुड़ा एक प्रसिद्ध विचार न्याय को शासन का आधार मानने से संबंधित है। उनके शासन की चर्चा में समानता और न्याय को महत्व देने की बात बार-बार सामने आती है।
हालांकि उनके शासनकाल को केवल सुधारों के नजरिए से देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। उस समय राजनीतिक असंतोष, प्रशासनिक चुनौतियां और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक समूहों के साथ तनाव भी मौजूद थे। इसलिए उनके शासन का इतिहास बहुआयामी था।
राज्य विषय व्यवस्था
1927 में राज्य विषय से जुड़ी व्यवस्था लागू की गई, जिसने जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों से संबंधित अधिकारों और सरकारी नौकरियों तथा भूमि जैसे विषयों पर विशेष प्रावधान किए।
बाद के दशकों में यह व्यवस्था जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक और सामाजिक पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल रही।
आर्थिक और संस्थागत विकास
उनके शासनकाल में स्थानीय उद्योगों, हस्तशिल्प और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के प्रयास हुए। संचार व्यवस्था के विकास पर भी ध्यान दिया गया।
1938 में जम्मू-कश्मीर बैंक की स्थापना उनके शासनकाल की प्रमुख आर्थिक संस्थागत घटनाओं में शामिल रही। इससे राज्य में संगठित बैंकिंग व्यवस्था के विकास को आधार मिला।
सड़क, संचार और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के प्रयासों ने भी राज्य के विभिन्न क्षेत्रों को प्रशासनिक और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने में भूमिका निभाई।
1947: इतिहास का सबसे निर्णायक दौर
महाराजा हरि सिंह के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्याय 1947 में सामने आया।
ब्रिटिश शासन समाप्त होने के बाद जम्मू-कश्मीर एक रियासत था और महाराजा हरि सिंह उसके शासक थे। उस समय रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ संबंध तय करने की स्थिति मिली थी।
अक्टूबर 1947 में जम्मू-कश्मीर पर कबायली हमला हुआ और परिस्थितियां तेजी से बदल गईं। इसी घटनाक्रम के बीच महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।
जम्मू-कश्मीर के आधिकारिक लोक भवन के इतिहास के अनुसार इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर महाराजा हरि सिंह और भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन के बीच 26/27 अक्टूबर 1947 को हस्ताक्षर हुए।
इसके बाद भारत की सैन्य सहायता जम्मू-कश्मीर पहुंची और राज्य का संघर्ष एक नए चरण में प्रवेश कर गया।
1948 में महाराजा ने लोकप्रिय अंतरिम सरकार की घोषणा की और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। जून 1949 में महाराजा के राज्य से बाहर जाने के बाद उनके पुत्र युवराज कर्ण सिंह को रीजेंट नियुक्त किया गया।
अंतिम वर्षों का जीवन
1949 के बाद महाराजा हरि सिंह की प्रत्यक्ष राजनीतिक भूमिका काफी सीमित हो गई। 1952 में जम्मू-कश्मीर में राजशाही व्यवस्था समाप्त होने के बाद उनका औपचारिक शासन भी समाप्त हो गया।
इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष मुख्य रूप से मुंबई में बिताए।
26 अप्रैल 1961 को मुंबई में महाराजा हरि सिंह का निधन हुआ। इस तरह 23 सितंबर 1895 को अमर महल, जम्मू से शुरू हुई उनकी जीवन यात्रा 26 अप्रैल 1961 को मुंबई में समाप्त हुई।
महाराजा हरि सिंह की विरासत
महाराजा हरि सिंह का जीवन जम्मू-कश्मीर के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जिसमें राजशाही, सामाजिक सुधार, शिक्षा, कृषि, प्रशासन और 1947 का राजनीतिक बदलाव—सभी एक साथ दिखाई देते हैं।
उनके शासनकाल में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने, महिला शिक्षा को बढ़ावा देने, सामाजिक भेदभाव के खिलाफ कदम उठाने, किसानों को कर्ज से राहत देने, सहकारी संस्थाओं को बढ़ावा देने तथा स्वास्थ्य और प्रशासनिक सेवाओं के विस्तार की दिशा में काम हुआ।
साथ ही उनके शासनकाल की राजनीतिक चुनौतियों और उस समय के सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों को भी इतिहास के व्यापक संदर्भ में समझना जरूरी है।
उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक पहचान में से एक 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ विलय से जुड़ी है। इस निर्णय ने जम्मू-कश्मीर और भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की दिशा को प्रभावित किया।
आज 23 सितंबर को जब महाराजा हरि सिंह की जयंती मनाई जाती है, तो यह अवसर केवल एक शासक को याद करने का नहीं, बल्कि उस दौर को समझने का भी है जिसमें शिक्षा, सामाजिक समानता, किसान कल्याण और आधुनिक प्रशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
महाराजा हरि सिंह का जीवन यह बताता है कि इतिहास में किसी भी व्यक्तित्व की विरासत को समझने के लिए उसके पूरे दौर, उसके फैसलों और उनके सामाजिक प्रभावों को साथ देखकर अध्ययन करना आवश्यक है।
23 सितंबर 2026 को उनकी 131वीं जयंती पर महाराजा हरि सिंह को याद करना जम्मू-कश्मीर के उस इतिहास को याद करना है, जिसमें बदलाव, संघर्ष, सुधार और राजनीतिक परिवर्तन—चारों एक साथ दिखाई देते हैं।
JNM पत्रकार हरदीप जम्वाल, जम्मू



