राज्यसभा चुनाव में इस बार भी मुकाबला बेहद रोमांचक हो गया है। पीडीपी के खुलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) को समर्थन देने के बाद समीकरण इस तरह बने हैं कि हर एक वोट की अहमियत बढ़ गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नतीजे आखिरी पल तक किसी भी तरफ जा सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में पहले भी कई बार ऐसे मौके आए हैं जब एक-एक वोट ने चुनाव का रुख तय किया है। 2015 में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार और पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद महज एक वोट से जीते थे। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी चंद्रमोहन शर्मा को हराया था। बताया जाता है कि उस समय तत्कालीन विधायक इंजीनियर रशीद के वोट ने आजाद की जीत सुनिश्चित की थी।
राजनीतिक विश्लेषक दिनेश मनहोत्रा का कहना है कि सज्जाद लोन के चुनाव से दूर रहने के ऐलान के बाद अब कुल 87 विधायक वोट डालेंगे। एनसी को उम्मीद है कि सात में से कम से कम पांच निर्दलीय विधायक उसके उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करेंगे, जबकि भाजपा भी दो निर्दलीयों को अपने पाले में करने की कोशिश कर रही है। इस स्थिति में हार-जीत का अंतर एक या दो वोटों का ही रहने की संभावना है।
विधान परिषद के चुनावों में तो दो बार ऐसा भी हुआ जब नतीजे पर्ची से तय हुए।
भाजपा विधायक विक्रम रंधावा बताते हैं कि 17 अप्रैल 2017 को हुए चुनाव में उन्हें और उनके प्रतिद्वंद्वी पीडीपी उम्मीदवार को 29-29 वोट मिले थे। इसके बाद पर्ची से फैसला हुआ और वह विजयी घोषित किए गए।
इसी तरह, 2009 में एनसी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्य सचिव विजय बकाया भी पर्ची से एमएलसी बने थे। उस वक्त कांग्रेस प्रत्याशी गुलाम नबी मोगा के साथ उन्हें बराबर वोट मिले थे, जिसके बाद किस्मत ने पर्ची के जरिए उन्हें जीत दिलाई।
जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पृष्ठभूमि में यह राज्यसभा चुनाव एक बार फिर से पुराने रोमांच को दोहराने वाला साबित हो सकता है — जहां हर वोट तय करेगा सत्ता का समीकरण और भाग्य की बाज़ी।


