JNM पत्रकार हरदीप जम्वाल, जम्मू
जम्मू-कश्मीर में नशे के खिलाफ पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई तेज होने के बाद नशा तस्करों ने अपना तरीका बदलना शुरू कर दिया है। हेरोइन और चरस की तस्करी पर बढ़ती सख्ती के बीच अब दर्द निवारक और अन्य चिकित्सकीय दवाओं का इस्तेमाल नशे के लिए तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। स्थानीय स्तर पर कुछ दवाओं को कोड नाम से युवाओं तक पहुंचाए जाने की बात भी सामने आई है।
पुलिस और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ट्रामाडोल और टैपेंटाडोल जैसी दवाओं का नशे के तौर पर इस्तेमाल चिंता का नया कारण बन गया है। ये दवाएं सामान्य तौर पर तेज दर्द और कुछ गंभीर चिकित्सकीय परिस्थितियों में डॉक्टर की सलाह पर दी जाती हैं, लेकिन नशे के आदी लोग इनका इस्तेमाल बड़ी मात्रा में कर रहे हैं।
पांच एटीएफ सेंटरों में 5,282 मामले
कश्मीर के पांच एडिक्शन ट्रीटमेंट फैसिलिटी (एटीएफ) सेंटरों में नशे से जुड़े 5,282 मामले सामने आए हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो पहले हेरोइन का सेवन करते थे और अब फार्मा ड्रग्स की ओर चले गए हैं।
कुलगाम के एटीएफ सेंटर में अकेले 1,951 मामले दर्ज किए गए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि नशे के पैटर्न में यह बदलाव पुलिस और स्वास्थ्य विभाग दोनों के लिए नई चुनौती बन रहा है।
नशा मुक्त जम्मू-कश्मीर अभियान के तहत अब तक 2,19,425 नशीली टैबलेट और कैप्सूल तथा 3.830 किलोग्राम कोडीन युक्त सिरप बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में करीब 5.4 लाख लोग ओपियाड की लत से जूझ रहे हैं।
बच्चों और किशोरों तक पहुंचा फार्मा नशा
सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि फार्मा ड्रग्स का असर बच्चों और किशोरों तक भी पहुंच रहा है। एसएमएचएस के नशा मुक्ति केंद्र में 10 से 18 वर्ष की उम्र के 1,900 से अधिक बच्चे ‘दूसरे नशे’ से जुड़ी समस्या के चलते उपचार के लिए पहुंचे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक इन मामलों में ट्रामाडोल, टैपेंटाडोल और प्रीगाबालिन जैसी दवाओं के इस्तेमाल की बात सामने आई है। कई बच्चे और किशोर इन गोलियों को नशीला पदार्थ नहीं मानते, जिसके कारण वे इनके सेवन के खतरे को गंभीरता से नहीं लेते। यही गलतफहमी धीरे-धीरे उन्हें निर्भरता और नशे की गिरफ्त में ले जा सकती है।
महंगी हेरोइन के मुकाबले आसान विकल्प
इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज, श्रीनगर के एचओडी डॉ. अरशद हुसैन के अनुसार हेरोइन महंगी होने और पुलिस कार्रवाई बढ़ने से इसकी उपलब्धता प्रभावित हुई है। इसके मुकाबले फार्मा ड्रग्स अपेक्षाकृत सस्ती होती हैं और छोटी होने के कारण इन्हें छिपाकर ले जाना भी आसान होता है।
रिपोर्ट के अनुसार करीब 37 प्रतिशत युवा इन दवाओं को दोस्तों के माध्यम से हासिल कर रहे हैं, जबकि 35 प्रतिशत सीधे केमिस्ट से इन्हें प्राप्त करने की बात सामने आई है। यह स्थिति दवा की बिक्री और निगरानी व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
21 एटीएफ और 12 एनजीओ केंद्रों से चल रहा इलाज
सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर में नशे की समस्या से निपटने के लिए 21 एडिक्शन ट्रीटमेंट फैसिलिटी और 12 एनजीओ केंद्रों के माध्यम से उपचार एवं पुनर्वास का काम किया जा रहा है। हालांकि फार्मा ड्रग्स के बढ़ते इस्तेमाल ने अब नशा मुक्ति व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
डीजीपी अनिल प्रभात के अनुसार 11 अप्रैल 2026 को शुरू किए गए नशा मुक्त अभियान के बाद जम्मू-कश्मीर में 3,257 एनडीपीएस मामले दर्ज किए गए हैं। इस दौरान 4,000 से अधिक लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं, जबकि 288 संपत्तियां जब्त की गई हैं।
नशे के खिलाफ कार्रवाई के बावजूद फार्मा ड्रग्स का युवाओं और बच्चों तक पहुंचना यह संकेत देता है कि अब केवल पारंपरिक नशीले पदार्थों की तस्करी रोकना पर्याप्त नहीं होगा। दवाओं की अवैध बिक्री, युवाओं में जागरूकता और नशे के इलाज के साथ-साथ फार्मा ड्रग्स की सप्लाई चेन पर निगरानी बढ़ाना भी बड़ी जरूरत बन गई है।



