JNM पत्रकार हरदीप जम्वाल | जम्मू
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की जम्मू पीठ ने वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी सुभाष चंद्र शर्मा की पदोन्नति से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाते हुए जम्मू-कश्मीर सरकार को तीन महीने के भीतर उनके मामले पर दोबारा विचार करने के निर्देश दिए हैं। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि विभाग में पद रिक्त होने मात्र से किसी कर्मचारी को पदोन्नति का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। हालांकि, यदि कर्मचारी निर्धारित नियमों के अनुसार पदोन्नति के लिए पात्र है, तो उसके दावे पर उचित तरीके से विचार करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है।
यह मामला वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी सुभाष चंद्र शर्मा की पदोन्नति से जुड़ा है। उन्होंने सरकार से वर्ष 2015 से संयुक्त निदेशक अभियोजन और जुलाई 2022 से निदेशक अभियोजन के पद पर पिछली तारीख से पदोन्नति देने की मांग की थी। उनका तर्क था कि संबंधित अवधि के दौरान विभाग में उच्च पद रिक्त थे और उनकी लंबी सेवा तथा विभागीय उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें इन पदों पर पदोन्नति का लाभ मिलना चाहिए था।
रिक्त पदों के आधार पर पदोन्नति की मांग
सुभाष चंद्र शर्मा ने अपने दावे में बताया कि अभियोजन विभाग में संयुक्त निदेशक अभियोजन के छह पद और निदेशक अभियोजन के दो पद रिक्त थे। उनका कहना था कि विभाग में लंबे समय तक सेवा देने के अलावा उन्हें डीजीपी पदक सहित अन्य उपलब्धियां भी हासिल हुई थीं। ऐसे में उनकी वरिष्ठता, अनुभव और सेवा रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए पदोन्नति के मामले पर विचार किया जाना चाहिए था।
उन्होंने इसी आधार पर संबंधित पदों पर पिछली तारीख से पदोन्नति देने की मांग की थी। उनका पक्ष था कि निर्धारित पद रिक्त होने और आवश्यक सेवा अनुभव उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें समय पर पदोन्नति का लाभ नहीं मिला।
सरकार ने क्या दलील दी?
इस मामले में जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2013 में सुभाष चंद्र शर्मा को उपनिदेशक अभियोजन के पद पर कार्यवाहक व्यवस्था के तहत तैनात किया गया था। सरकार ने यह भी बताया कि विभाग में नियमित पदोन्नतियों की प्रक्रिया वरिष्ठता से जुड़े विवादों के कारण प्रभावित हुई थी, जिसके चलते पदोन्नति देने में देरी हुई।
सरकार के अनुसार, कार्यवाहक व्यवस्था के तहत किसी पद पर जिम्मेदारी संभालना और नियमित पदोन्नति मिलना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए पदोन्नति के दावे पर विचार करते समय लागू भर्ती नियमों और संबंधित सेवा शर्तों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सुभाष चंद्र शर्मा को दिसंबर 2022 में नियमित पदोन्नति दी गई थी। हालांकि, इससे पहले की अवधि के लिए पदोन्नति का लाभ देने का उनका दावा अधिकरण के समक्ष विचाराधीन था।
कैट ने किन आधारों पर पुनर्विचार करने को कहा?
कैट की जम्मू पीठ ने मामले पर विचार करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि सुभाष चंद्र शर्मा की पदोन्नति के दावे की जांच संबंधित नियमों और तथ्यों के आधार पर नए सिरे से की जाए। अधिकरण ने कहा कि केवल रिक्त पदों की उपलब्धता पदोन्नति का अधिकार पैदा नहीं करती, लेकिन कर्मचारी की पात्रता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अधिकरण के निर्देशों के अनुसार, सरकार को निम्नलिखित पहलुओं पर विचार करना होगा:
- भर्ती नियम: संबंधित पदों पर पदोन्नति के लिए लागू नियमों और निर्धारित पात्रता की जांच की जाए।
- संशोधित वरिष्ठता सूची: कर्मचारी की वरिष्ठता का निर्धारण लागू नियमों और संशोधित वरिष्ठता के आधार पर किया जाए।
- रिक्त पदों की स्थिति: संबंधित अवधि में संयुक्त निदेशक अभियोजन और निदेशक अभियोजन के पदों की उपलब्धता की जांच की जाए।
- कार्यवाहक सेवा की गणना: कार्यवाहक व्यवस्था के तहत दी गई सेवा का पदोन्नति की पात्रता पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका नियमों के अनुसार आकलन किया जाए।
इन सभी पहलुओं की जांच के बाद यह तय किया जाना है कि सुभाष चंद्र शर्मा संबंधित पदों पर पिछली तारीख से पदोन्नति के लिए पात्र थे या नहीं।
पात्र पाए जाने पर विभागीय पदोन्नति समिति के सामने रखा जाएगा मामला
कैट ने जम्मू-कश्मीर सरकार को निर्देश दिया है कि वह तीन महीने के भीतर इस मामले पर पुनर्विचार की प्रक्रिया पूरी करे। यदि नियमों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर सुभाष चंद्र शर्मा पदोन्नति के लिए पात्र पाए जाते हैं, तो उनके मामले को विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) या सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
इसके बाद संबंधित समिति या सक्षम प्राधिकारी नियमानुसार उनके दावे पर निर्णय लेगा। यानी अधिकरण ने सीधे तौर पर पिछली तारीख से पदोन्नति देने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि सरकार को पात्रता की दोबारा जांच कर उचित निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।
क्या है इस फैसले का महत्व?
कैट का यह फैसला सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी विभाग में पद खाली होने के आधार पर कर्मचारी स्वतः पदोन्नति का दावा नहीं कर सकता। पदोन्नति के लिए संबंधित भर्ती नियमों, वरिष्ठता, पात्रता और निर्धारित चयन प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
वहीं, विभाग की ओर से किसी कर्मचारी के पदोन्नति दावे पर विचार करते समय उसकी पात्रता और सेवा संबंधी रिकॉर्ड की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। सुभाष चंद्र शर्मा के मामले में अब जम्मू-कश्मीर सरकार को निर्धारित समयसीमा के भीतर इन सभी पहलुओं की समीक्षा करनी होगी।
फिलहाल, मामले में अगला कदम सरकार की ओर से की जाने वाली पुनर्विचार प्रक्रिया और उसके बाद लिए जाने वाले निर्णय पर निर्भर करेगा। यदि सुभाष चंद्र शर्मा निर्धारित नियमों के तहत पात्र पाए जाते हैं, तो उनके मामले को संबंधित विभागीय समिति या सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रखा जाएगा।



