JNM पत्रकार हरदीप जम्वाल, जम्मू
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इन दिनों सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के भीतर बढ़ती नाराजगी ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार के सामने अब विपक्ष से ज्यादा चुनौती अपनी ही पार्टी के असंतुष्ट विधायकों से मिलती दिखाई दे रही है। हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। असंतुष्ट विधायकों का दावा है कि उनकी संख्या 18 नहीं, बल्कि 25 तक पहुंच चुकी है। यदि यह दावा सही साबित होता है तो आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
दरअसल, नेकां में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर कई विधायक नाराज बताए जा रहे हैं। उनकी शिकायत है कि सरकार में जिम्मेदारियों और मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के भीतर सभी नेताओं को उचित महत्व नहीं दिया गया। यही वजह है कि अब पार्टी के कुछ विधायक एकजुट होकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। हालांकि, इन विधायकों की वास्तविक संख्या और उनके अगले कदम को लेकर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
90 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 48
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल 90 निर्वाचित सीटें हैं। वर्ष 2024 में हुए विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि भारतीय जनता पार्टी 29 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। कांग्रेस को 6, पीडीपी को 3 और अन्य दलों तथा निर्दलीय उम्मीदवारों को शेष सीटें मिली थीं।
सरकार बनाने के लिए 48 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। चुनाव के बाद नेकां ने कांग्रेस और अन्य सहयोगियों के समर्थन से सरकार बनाई और उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। हालांकि, उमर अब्दुल्ला ने दो विधानसभा क्षेत्रों गांदरबल और बडगाम से चुनाव जीता था। बाद में उन्होंने बडगाम सीट छोड़ दी थी, जिसके बाद वहां हुए उपचुनाव में पीडीपी उम्मीदवार आगा सैयद मुंतजिर मेहदी ने जीत दर्ज की थी।
ऐसे में अब नेकां के पास विधानसभा में 41 विधायक हैं। यदि पार्टी के 25 विधायक वास्तव में असंतुष्ट हैं तो यह संख्या राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।
मंत्रिमंडल विस्तार बना नाराजगी की बड़ी वजह
हालिया मंत्रिमंडल विस्तार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि कुछ विधायक सरकार में अपनी भूमिका और मंत्रियों के चयन से संतुष्ट नहीं हैं। असंतुष्ट गुट की ओर से मंत्रिमंडल में बदलाव और कुछ मंत्रियों को हटाने की मांग भी उठाई जा रही है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती तब पैदा होती है, जब उसके अपने ही विधायक नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठाने लगें। यदि समय रहते इस नाराजगी को दूर नहीं किया गया तो इसका असर सरकार के कामकाज और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर भी पड़ सकता है।
क्या भाजपा इस राजनीतिक स्थिति का उठा सकती है फायदा?
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा की भी नजर बनी हुई है। भाजपा के पास 29 विधायक हैं और वह विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। ऐसे में यदि नेकां के भीतर असंतोष और बढ़ता है तो भाजपा के लिए प्रदेश की राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर बन सकता है।
हालांकि, केवल विधायकों की नाराजगी के आधार पर किसी सरकार के गिरने का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। इसके लिए जरूरी होगा कि असंतुष्ट विधायक वास्तव में कोई सामूहिक राजनीतिक फैसला लें और सदन में अपना रुख स्पष्ट करें।
महाराष्ट्र की राजनीति से क्यों की जा रही तुलना?
नेकां में चल रहे घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में हुए विभाजन से भी की जा रही है। जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के कई विधायकों के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की थी। इसके बाद महाराष्ट्र की सत्ता और पार्टी के नेतृत्व में बड़ा बदलाव आया।
इसी तरह जुलाई 2023 में अजित पवार ने एनसीपी के कई विधायकों के साथ अपने चाचा शरद पवार से अलग रास्ता अपनाया था। बाद में चुनाव आयोग ने अजित पवार के गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न प्रदान किया था।
इन उदाहरणों के कारण जम्मू-कश्मीर में भी यह सवाल उठने लगा है कि क्या नेकां के भीतर चल रहा असंतोष भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का रूप ले सकता है।
उमर अब्दुल्ला के सामने सबसे बड़ी चुनौती
फिलहाल मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी को एकजुट रखने की है। उन्हें न केवल नाराज विधायकों की शिकायतों को समझना होगा, बल्कि सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल भी बनाना होगा।
दूसरी तरफ असंतुष्ट विधायकों के दावों ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। यदि दोनों पक्षों के बीच बातचीत से समाधान निकलता है तो सरकार अपना कार्यकाल सामान्य तरीके से आगे बढ़ा सकती है। लेकिन यदि नाराजगी बगावत में बदलती है तो इसका असर केवल सरकार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के भविष्य और प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उमर अब्दुल्ला अपने नाराज विधायकों को मनाने में सफल होंगे या फिर नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर उठ रही असंतोष की आवाज आने वाले समय में एक बड़े राजनीतिक संकट का रूप लेगी?

