JNM संवाददाता | जम्मू
हरदीप जमवाल
जम्मू-कश्मीर उपचुनावों के नतीजों ने प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। एक तरफ नगरोटा में भाजपा ने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली, वहीं बडगाम में पीडीपी ने अप्रत्याशित जीत दर्ज करते हुए नेशनल कांफ्रेंस को बड़ा झटका दिया। दोनों ही सीटों पर हार ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व और सियासी रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नगरोटा: देवयानी राणा की बड़ी जीत, भाजपा का किला फिर मजबूत
नगरोटा विधानसभा सीट पर भाजपा की देवयानी राणा ने 24,647 वोटों से जीत दर्ज की और पार्टी का परचम एक बार फिर लहराया।
देवयानी ने कुल 42,350 वोट हासिल किए, जबकि जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी के हर्ष देव सिंह को 17,703 वोट मिले।
नेशनल कॉन्फ्रेंस की शमीम बेगम 10,872 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।
देवयानी की जीत में दो फैक्टर प्रमुख रहे—
दिवंगत पिता देविंदर सिंह राणा की विरासत
भाजपा संगठन की पूरी ताकत और सहानुभूति लहर
इन्हीं तत्वों की बदौलत भाजपा ने यह सीट न सिर्फ बचाई बल्कि बढ़त भी और बढ़ा ली।
बडगाम: पीडीपी की जीत, नाराजगी ने एनसी को डुबोया
बडगाम में पीडीपी प्रत्याशी आगा सैयद मुंतजिर मेहदी ने 21,576 वोट हासिल कर 4,478 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
एनसी के आगा सैयद महमूद को 17,098 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी आगा सैयद मोहसिन को सिर्फ 2,619 वोट मिले।
इस जीत-हार की कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं—भावनाओं और नाराजगी की भी है।
एनसी नेता रुहुल्ला की नाराजगी, उनका क्षेत्र से दूरी बनाना और जर्मनी रवाना होना, बडगाम के मतदाताओं ने एक संदेश की तरह लिया।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला उन्हें मनाने में नाकाम रहे, और जनता ने नाराजगी सीधे ईवीएम में दर्ज कर दी।
उपमुख्यमंत्री की सियासत पर भी पड़ा असर
नगरोटा में एनसी की भारी हार का सीधा असर उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी की राजनीतिक हसरतों पर भी पड़ सकता है।
वे पूरे चुनाव में सबसे अधिक सक्रिय चेहरा रहे, आक्रामक प्रचार किया और खुद को प्रभावी नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश की।
लेकिन नतीजों ने उनके प्रयासों को भी बेअसर कर दिया, जिससे पार्टी के भीतर उनकी भूमिका और भविष्य पर सवाल खड़े हो गए।

उपचुनावों ने साफ कर दिया है कि जनता का मूड बदल रहा है। नगरोटा और बडगाम—दोनों जगहों पर फैसलों ने यह संदेश दे दिया कि जमीन का सच किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा पैमाना होता है।
एनसी की डबल हार सिर्फ राजनीतिक पराजय नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि नेतृत्व से दूर होते जनमत को तुरंत संभालने की जरूरत है।

