रसोई में रखी चीनी की मिठास इन दिनों जेब के लिए कड़वी होती जा रही है। चाय का एक कप हो, मिठाई की दुकान हो या त्योहारों की तैयारी—चीनी की बढ़ती कीमत अब आम आदमी के बजट को प्रभावित करने लगी है। सवाल सीधा है कि आखिर जिस देश में गन्ने का उत्पादन पर्याप्त है, वहां चीनी लगातार महंगी क्यों हो रही है?
इस सवाल का जवाब सिर्फ इतना नहीं है कि बाजार में चीनी कम है। असल कहानी इसके पीछे छिपी मांग और आपूर्ति, त्योहारों की बढ़ती खपत, उत्पादन लागत, चीनी के इथेनॉल की ओर डायवर्जन, शुरुआती स्टॉक में कमी और बाजार में जमाखोरी-सट्टेबाजी जैसे कई कारणों से जुड़ी है।
कहानी की शुरुआत पीछे से होती है
चीनी की कीमतों को समझने के लिए पहले कुछ साल पीछे जाना होगा। भारत में चीनी का बाजार हमेशा एक संतुलन पर चलता रहा है। एक तरफ गन्ना किसान है, जिसे अपनी फसल का अच्छा दाम चाहिए। दूसरी तरफ चीनी मिलें हैं, जिन्हें बढ़ती उत्पादन लागत के बीच अपना कारोबार चलाना है। तीसरी तरफ आम उपभोक्ता है, जो चाहता है कि चीनी सस्ती रहे।
पिछले कुछ वर्षों में कई बार चीनी मिलों को उत्पादन लागत से कम कीमत पर चीनी बेचनी पड़ी। इससे मिलों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ा। इसी दौरान सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति को बढ़ावा दिया। चीनी उद्योग से निकलने वाले एक हिस्से को इथेनॉल उत्पादन की तरफ मोड़ा जाने लगा।
यहीं से चीनी को लेकर एक नई बहस शुरू हुई—क्या पेट्रोल के लिए इथेनॉल जरूरी है या इससे बाजार में उपलब्ध चीनी पर दबाव पड़ रहा है?
फिर आया आज का दौर
अब अगस्त 2026 में तस्वीर बदल चुकी है। देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 62.47 रुपये प्रति किलो पहुंच चुकी है। एक साल पहले यह करीब 46.30 रुपये प्रति किलो थी। यानी एक साल में कीमत में करीब 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
कुछ राज्यों में स्थिति इससे भी ज्यादा गंभीर है। ओडिशा में 23 अगस्त को चीनी की कीमत करीब 67.40 रुपये प्रति किलो दर्ज की गई।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कहानी में गन्ने की कमी पूरी तरह फिट नहीं बैठती। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के आंकड़ों के मुताबिक इस साल गन्ने का उत्पादन करीब 500 मिलियन टन रहा है, जो पिछले साल के अनुमान से अधिक है।
तो फिर चीनी महंगी क्यों?
क्योंकि उत्पादन पर्याप्त होना और बाजार में उसी अनुपात में चीनी उपलब्ध होना दो अलग बातें हैं।
इस साल शुरुआती स्टॉक करीब 35 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि पिछले साल यह लगभग 50 लाख टन था। दूसरी तरफ त्योहारों का मौसम सामने है। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ती है।
यानी बाजार एक ऐसे समय में प्रवेश कर रहा है जब मांग बढ़ रही है और शुरुआती स्टॉक पिछले साल के मुकाबले कम है।
क्या इथेनॉल ही जिम्मेदार है?
यह सवाल राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुका है।
विपक्ष का आरोप है कि चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने से बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई और कीमतें बढ़ीं।
लेकिन केंद्र सरकार इससे सहमत नहीं है। सरकार का कहना है कि इथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 के करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में लगभग 9 प्रतिशत रह गया है। सरकार यह भी बताती है कि अब देश में उत्पादित इथेनॉल का बड़ा हिस्सा अनाज, खासकर मक्का से आता है।
इसलिए पूरी जिम्मेदारी इथेनॉल पर डालना तस्वीर को अधूरा देखना होगा।
बाजार में एक और खिलाड़ी है—मांग और डर
कई बार बाजार में वास्तविक कमी से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि व्यापारियों को भविष्य में कमी की आशंका कितनी है।
अगर त्योहारों से पहले व्यापारी मानने लगें कि चीनी महंगी होने वाली है, तो स्टॉक बढ़ाने की कोशिश शुरू हो सकती है। यही वजह है कि सरकार ने चीनी डीलरों पर स्टॉक सीमा लगाने जैसे कदम उठाए हैं।
चीनी उद्योग का कहना है कि देश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और मौजूदा तेजी का एक हिस्सा सट्टेबाजी और कृत्रिम कमी की धारणा से पैदा हुआ है।
यानी बाजार में सिर्फ चीनी नहीं, बल्कि कीमत बढ़ने की उम्मीद भी कारोबार कर रही है।
अब सरकार की परीक्षा है
सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए करीब एक दशक बाद पहली बार 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी है। इसके अलावा स्टॉक सीमा भी लागू की गई है।
लेकिन सरकार के सामने एक मुश्किल संतुलन है।
अगर वह चीनी बहुत सस्ती कर देती है, तो मिलों पर दबाव बढ़ सकता है। अगर मिलों की आर्थिक स्थिति खराब होती है तो भविष्य में किसानों के गन्ने के भुगतान पर असर पड़ सकता है।
लेकिन अगर कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो इसका सीधा असर उपभोक्ता पर पड़ेगा।
कल की तस्वीर कैसी होगी?
आने वाले महीनों में चीनी की कीमतों का रास्ता कई चीजें तय करेंगी—त्योहारों की मांग, आयातित चीनी की उपलब्धता, बाजार में मौजूद स्टॉक, अगले गन्ना सीजन का उत्पादन और सरकार के फैसले।
अगर आयात और स्टॉक नियंत्रण से बाजार में पर्याप्त आपूर्ति आती है, तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन त्योहारों के दौरान मांग बहुत ज्यादा बढ़ी और बाजार में जमाखोरी या सट्टेबाजी जारी रही, तो कीमतों को नीचे लाना आसान नहीं होगा।
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।
चीनी महंगी होने की कहानी सिर्फ खेत में पैदा होने वाले गन्ने की कहानी नहीं है। यह किसान से लेकर चीनी मिल, इथेनॉल नीति से लेकर त्योहारों की मांग और बाजार के व्यापारियों तक फैली हुई पूरी आर्थिक कहानी है।
आज सवाल यह नहीं है कि चीनी महंगी है या नहीं। सवाल यह है कि क्या आने वाले महीनों में सरकार इस मिठास की कीमत को आम आदमी की पहुंच में वापस ला पाएगी?
— पत्रकार हरदीप जम्वाल, जम्मू


