JNM पत्रकार हरदीप जम्वाल, जम्मू
दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में मिठाइयों की मांग तेजी से बढ़ गई है। घरों में मेहमानों के स्वागत से लेकर रिश्तेदारों को मिठाई भेंट करने तक, हर तरफ मिठाइयों की खरीदारी का माहौल है। लेकिन इस त्योहार की मिठास के बीच मिलावट का खतरा भी लोगों की चिंता बढ़ा रहा है। जम्मू संभाग में दूध और खोए की बढ़ती मांग तथा स्थानीय उत्पादन में अंतर के चलते बाजारों में मिलावटी और सिंथेटिक मावे की आपूर्ति बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि त्योहार के मौके पर लोग जो मिठाइयां अपने परिवार के लिए खरीद रहे हैं, वे वास्तव में कितनी सुरक्षित हैं।
जानकारी के अनुसार, त्योहारी मौसम में दूध और खोए की खपत सामान्य दिनों के मुकाबले काफी बढ़ जाती है। वहीं जम्मू संभाग में स्थानीय स्तर पर दूध का उत्पादन मांग के अनुपात में पर्याप्त नहीं है। सामान्य दिनों में संभाग में प्रतिदिन करीब 4.5 से 5 लाख लीटर दूध की खपत होती है, जबकि स्थानीय उत्पादन लगभग 3.5 से 3.8 लाख लीटर के बीच बताया जाता है। इस कमी को सामान्य दिनों में पैकेट वाले दूध और अन्य माध्यमों से पूरा किया जाता है। हालांकि त्योहारों के दौरान मांग में अचानक बढ़ोतरी होने से आपूर्ति व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
वर्ष 2024 में दीपावली के दौरान दूध की दैनिक मांग करीब 7.5 से 8 लाख लीटर तक पहुंच गई थी, जबकि स्थानीय उत्पादन लगभग 4 लाख लीटर के आसपास था। वर्ष 2025 में मांग बढ़कर 8.5 लाख लीटर प्रतिदिन से अधिक हो गई, जबकि स्थानीय आपूर्ति करीब 4.2 लाख लीटर तक ही सीमित रही। इस वर्ष 2026 में त्योहार के दौरान दूध की मांग 9 लाख लीटर प्रतिदिन के पार जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। मांग और उत्पादन के बीच इस बड़े अंतर के कारण बाहर से आने वाले खोए और मावे की मात्रा भी बढ़ने की संभावना है।
मांग और आपूर्ति के अंतर का उठाया जा सकता है फायदा
खोआ और मावा मिठाइयां तैयार करने का प्रमुख आधार हैं। एक किलो शुद्ध खोआ बनाने के लिए लगभग चार से पांच लीटर फुल क्रीम दूध की आवश्यकता होती है। ऐसे में जब दूध की उपलब्धता सीमित हो और बाजार में खोए की मांग लगातार बढ़ रही हो, तो कुछ लोग कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने के लिए मिलावट का सहारा ले सकते हैं। इसी स्थिति का फायदा उठाकर संदिग्ध गुणवत्ता वाला मावा बाजार में पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
बताया जा रहा है कि जम्मू के बाजारों में पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी मात्रा में मावा और खोआ पहुंचता है। ऐसे में इसकी गुणवत्ता की जांच और आपूर्ति के स्रोत पर निगरानी रखना खाद्य सुरक्षा विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
नकली मावा तैयार करने में इस्तेमाल हो सकती हैं घटिया सामग्री
मिलावटखोरी के मामलों में दूध के स्थान पर विभिन्न रासायनिक और कृत्रिम पदार्थों का इस्तेमाल किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। नकली मावे को असली जैसा दिखाने के लिए कुछ मिलावटखोर स्टार्च, उबले आलू, सस्ते खाद्य तेल और अन्य घटिया सामग्री का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा और यूरिया जैसे हानिकारक पदार्थों के इस्तेमाल के दावे भी किए जा रहे हैं।
इन पदार्थों का उद्देश्य मावे का वजन बढ़ाना, उसका रंग और बनावट बदलना तथा उसे देखने में असली खोए जैसा बनाना होता है। हालांकि किसी विशेष खेप में इन पदार्थों की मौजूदगी की पुष्टि केवल प्रयोगशाला जांच के माध्यम से ही की जा सकती है।
मिलावटी मिठाइयां स्वास्थ्य के लिए बन सकती हैं खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, दूषित और मिलावटी खाद्य पदार्थों का सेवन शरीर के लिए गंभीर नुकसानदायक हो सकता है। खराब गुणवत्ता वाले दूध और मावे से तैयार मिठाइयां खाने के बाद उल्टी, दस्त, पेट दर्द, फूड पॉइजनिंग और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।
वहीं यदि खाद्य पदार्थों में डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा या अन्य अखाद्य रसायनों की मिलावट हो तो इसका असर शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर भी पड़ सकता है। लगातार ऐसे पदार्थों का सेवन लिवर और किडनी की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। घटिया तेल और हानिकारक रसायनों का लंबे समय तक सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिए भी जोखिम पैदा कर सकता है।
खासकर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए मिलावटी खाद्य सामग्री अधिक नुकसानदायक साबित हो सकती है। इसलिए त्योहारों के दौरान मिठाइयां खरीदते समय केवल कीमत और दिखावट पर ध्यान देने के बजाय उनकी गुणवत्ता को प्राथमिकता देना जरूरी है।
बाजार से मिठाई खरीदने में लोगों को सता रहा डर
त्योहारी सीजन में मिलावट की आशंकाओं ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। लोगों का कहना है कि दीपावली जैसे त्योहार पर मिठाइयों की खरीदारी से बचना मुश्किल होता है, लेकिन बाजार में मिलावट की खबरें सामने आने के बाद खरीदारी करते समय सावधानी बरतनी पड़ती है।
गांधी नगर निवासी विजय चौधरी के अनुसार, त्योहारों पर मिठाइयां खरीदना परंपरा का हिस्सा है, लेकिन अब मावे से बनी मिठाइयां खरीदते समय भी मन में संदेह बना रहता है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष त्योहार के बाद उनके परिवार के दो सदस्य फूड पॉइजनिंग की समस्या से प्रभावित हुए थे। उनका मानना है कि प्रशासन को बाहर से आने वाले मावे की जांच के लिए प्रवेश मार्गों पर विशेष व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि संदिग्ध खाद्य सामग्री बाजारों तक पहुंचने से पहले ही पकड़ी जा सके।
ईमानदार दुकानदारों की साख पर भी पड़ता है असर
मिलावट का खतरा केवल उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर उन व्यापारियों पर भी पड़ता है जो लंबे समय से शुद्ध और गुणवत्तापूर्ण मिठाइयां तैयार कर रहे हैं। वरिष्ठ दुकानदार दर्शन शर्मा का कहना है कि उनका परिवार पीढ़ियों से शुद्ध खोए से मिठाइयां तैयार करता आ रहा है। लेकिन बाहर से आने वाले सस्ते और मिलावटी मावे के कारण ईमानदारी से कारोबार करने वाले दुकानदारों को भी नुकसान उठाना पड़ता है।
उनके अनुसार, जब बाजार में कम कीमत पर संदिग्ध गुणवत्ता वाला मावा उपलब्ध होता है तो इसका सीधा असर शुद्ध सामग्री इस्तेमाल करने वाले व्यापारियों के कारोबार पर पड़ता है। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि दूसरे राज्यों से आने वाले मावे की नियमित जांच की जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।
प्रवेश द्वारों से लेकर मिठाई की दुकानों तक निगरानी
त्योहारी सीजन को देखते हुए खाद्य सुरक्षा विभाग ने भी निगरानी बढ़ाने की बात कही है। डिप्टी कमिश्नर फूड रफी अहमद डार के अनुसार, विभाग पूरी तरह सतर्क है और जम्मू संभाग में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई की जा रही है।
उन्होंने बताया कि लखनपुर सीमा, जम्मू रेलवे स्टेशन और शहर के अन्य प्रमुख प्रवेश मार्गों पर निगरानी रखी जा रही है। इसके साथ ही मिठाई की दुकानों और गोदामों से भी समय-समय पर नमूने एकत्र किए जा रहे हैं। मौके पर प्राथमिक जांच की व्यवस्था भी की गई है। यदि किसी खाद्य सामग्री में मिलावट या गुणवत्ता संबंधी अनियमितता पाई जाती है तो खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सवाल यह है कि त्योहार से पहले कितनी प्रभावी होगी जांच?
दीपावली के दौरान मिठाइयों की मांग हर वर्ष बढ़ती है, लेकिन इसके साथ खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। प्रशासन की निगरानी और जांच के बावजूद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बाजार में पहुंचने वाली प्रत्येक संदिग्ध खेप की समय पर जांच हो पाएगी? क्या बाहर से आने वाले मावे की गुणवत्ता की नियमित जांच के लिए पर्याप्त व्यवस्था है? और क्या मिलावट करने वालों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होगी जिससे भविष्य में इस तरह के मामलों पर रोक लग सके?
त्योहार की असली खुशी तभी बनी रह सकती है, जब लोगों को मिलने वाली मिठाइयां स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिहाज से भी सुरक्षित हों। इसलिए प्रशासन, व्यापारियों और उपभोक्ताओं तीनों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, ताकि दीपावली की मिठास किसी परिवार के लिए परेशानी का कारण न बने।



