JNM पत्रकार हरदीप जम्वाल | जम्मू
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के जारी सत्र में मंगलवार को कांग्रेस विधायक निजामुद्दीन बट ने विधानसभा की शक्तियों, विधायकों के विशेषाधिकार और निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। बट ने सदन में यह मुद्दा उठाया कि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को अन्य राज्यों की विधानसभाओं से अलग मानने का संवैधानिक आधार आखिर क्या है। उन्होंने सरकार और संबंधित अधिकारियों से इस संबंध में स्पष्ट जवाब मांगा।
बट ने सवाल उठाते हुए कहा कि संविधान में उन्हें वह प्रावधान दिखाया जाए, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को अन्य विधानसभाओं से अलग माना गया है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो फिर निर्वाचित विधायकों के अधिकारों और विधानसभा के कामकाज पर अलग तरह की सीमाएं क्यों लगाई जा रही हैं।
“क्या सरकार की मंत्रिपरिषद पंचायत बोर्ड है?”
विधानसभा में अपनी बात रखते हुए निजामुद्दीन बट ने सरकार की मंत्रिपरिषद और निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़ा किया। उन्होंने पूछा कि “क्या सरकार की मंत्रिपरिषद कोई पंचायत बोर्ड है?” उनका तर्क था कि मंत्री जनता के जनादेश से आते हैं और जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं।
बट ने कहा कि यदि मंत्रियों के कामकाज को लेकर किसी तरह की सीमा या आपत्ति है, तो उसका स्पष्ट संवैधानिक और कानूनी आधार सदन के सामने रखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों और सदन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने का आधार क्या है।
विधानसभा के विशेषाधिकारों पर भी सवाल
कांग्रेस विधायक ने विधानसभा और उसके सदस्यों को मिलने वाले विशेषाधिकारों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों को लेकर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए और यदि किसी अधिकारी या विभाग की ओर से विधानसभा के कामकाज को लेकर कोई पत्र जारी किया गया है, तो उसे सदन के पटल पर रखा जाना चाहिए।
निजामुद्दीन बट ने विशेष रूप से मुख्य सचिव और कानून सचिव की ओर से भेजे गए पत्राचार को विधानसभा के रिकॉर्ड का हिस्सा बनाने और उस पर सदन में चर्चा कराने की मांग की। यह मुद्दा राज्य का दर्जा बहाल करने से संबंधित विधानसभा प्रस्ताव के संदर्भ में उठा।
कानूनी आधार को लेकर उठाया सवाल
बट ने संविधान के अनुच्छेद 239 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 का हवाला देते हुए सवाल किया कि इन प्रावधानों में ऐसा क्या है, जिसके आधार पर विधानसभा के अधिकारों को अन्य विधानसभाओं से अलग तरीके से देखा जाए।
वहीं, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम की धारा 30 में विधानसभा के सदस्यों के भाषण और मतदान से संबंधित विशेषाधिकारों का प्रावधान है। इसी धारा में विधानसभा और उसके सदस्यों के अन्य अधिकारों एवं विशेषाधिकारों को लेकर भी प्रावधान किया गया है। धारा 32 में विधानसभा की विधायी शक्तियों का दायरा निर्धारित किया गया है, जिसमें कुछ विषयों को विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा गया है।
सदन में पत्र रखने की मांग
निजामुद्दीन बट का कहना था कि यदि विधानसभा की शक्तियों, अध्यक्ष के अधिकारों या मंत्रियों के कामकाज को लेकर कोई प्रशासनिक या कानूनी पत्राचार हुआ है, तो उसे सदन के सामने लाया जाना चाहिए ताकि निर्वाचित सदस्य उस पर चर्चा कर सकें।
उन्होंने कहा कि विधानसभा जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का मंच है और उसके अधिकारों से जुड़े किसी भी महत्वपूर्ण मामले पर सदन में चर्चा होनी चाहिए। बट ने संबंधित अधिकारियों से विधानसभा और उसके सदस्यों की शक्तियों, विशेषाधिकारों तथा कामकाज की संवैधानिक स्थिति पर स्पष्टता देने की मांग की।
राज्य का दर्जा बहाली प्रस्ताव के बीच बढ़ी बहस
निजामुद्दीन बट के ये सवाल ऐसे समय सामने आए हैं, जब जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य का पूर्ण दर्जा बहाल करने को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। 28 सितंबर को विधानसभा ने पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया था। प्रस्ताव को लेकर सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस भी हुई और भाजपा विधायकों ने विरोध करते हुए वॉकआउट किया।
विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार मौजूदा छठा सत्र 21 सितंबर से 30 सितंबर 2026 तक निर्धारित है। इस सत्र के लिए 548 प्रश्न सूचीबद्ध किए गए हैं और सदन की कार्यवाही से जुड़े कई विधायी तथा प्रशासनिक विषयों पर चर्चा हो रही है।
ऐसे में निजामुद्दीन बट द्वारा उठाए गए सवालों ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की संवैधानिक स्थिति, निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकार, विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है। अब सवाल यह है कि सरकार और संबंधित अधिकारी इन संवैधानिक सवालों पर सदन में क्या स्पष्टीकरण देते हैं।



