JNM पत्रकार हरदीप जम्वाल | जम्मू
खेती के लिए अधिक जमीन उपलब्ध न होने और रोजगार के सीमित अवसरों के बीच मशरूम उत्पादन किसानों, बेरोजगार युवाओं, महिलाओं और छोटे उद्यमियों के लिए आय का एक नया विकल्प बन सकता है। पारंपरिक खेती के मुकाबले मशरूम की खेती कम जगह में भी शुरू की जा सकती है। इसके लिए खाली कमरे, छोटे शेड या उपयुक्त वातावरण वाली इकाई का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, इस व्यवसाय में सफलता हासिल करने के लिए सही तकनीक, तापमान नियंत्रण, अच्छी गुणवत्ता वाले बीज यानी स्पान और बाजार में बिक्री की व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
इसी दिशा में शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, जम्मू (स्कास्ट-जम्मू) की ओर से इच्छुक लोगों को मशरूम उत्पादन की आधुनिक तकनीक सिखाने के लिए तीन दिवसीय व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। यह कार्यक्रम 4 से 6 नवंबर, 2026 तक विश्वविद्यालय के मशरूम अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र, चट्ठा में आयोजित होगा। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को मशरूम उत्पादन के साथ-साथ स्पान तैयार करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया की जानकारी भी दी जाएगी।
कम जगह में शुरू किया जा सकता है कारोबार
मशरूम की खेती उन लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है, जिनके पास खेती के लिए पर्याप्त जमीन नहीं है। छोटे स्तर पर इसकी शुरुआत करने के लिए उपलब्ध कमरे या शेड का इस्तेमाल किया जा सकता है। उत्पादन बढ़ाने के लिए जगह, संसाधनों और बाजार की मांग के अनुसार धीरे-धीरे व्यवसाय का विस्तार किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जम्मू क्षेत्र में मशरूम की विभिन्न किस्मों के उत्पादन की संभावनाएं मौजूद हैं। पहले यहां बटन मशरूम का उत्पादन अधिक प्रचलित था, लेकिन अब अलग-अलग किस्मों की खेती की ओर भी ध्यान दिया जा रहा है। सही किस्म का चुनाव स्थानीय मौसम, उपलब्ध सुविधाओं और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
बटन और ढिंगरी मशरूम से शुरुआत का विकल्प
मशरूम उत्पादन शुरू करने से पहले इसकी किस्म का चुनाव करना महत्वपूर्ण है। बटन मशरूम की खेती के लिए कंपोस्ट तैयार करने और फलन के दौरान उपयुक्त ठंडे तापमान की जरूरत होती है। जम्मू में गर्मियों के दौरान तापमान अधिक रहने के कारण बिना उचित शीतलन व्यवस्था के इसका उत्पादन चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
दूसरी ओर, आयस्टर मशरूम, जिसे ढिंगरी मशरूम भी कहा जाता है, उपलब्ध संसाधनों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार छोटे स्तर पर शुरुआत करने का विकल्प बन सकती है। नए लोगों को सलाह दी जाती है कि वे पहले सीमित मात्रा में उत्पादन करके अनुभव प्राप्त करें। इसके बाद बाजार की मांग और अपनी उत्पादन क्षमता के आधार पर व्यवसाय का विस्तार करें।
होटल, रेस्तरां और सब्जी बाजार में बिक्री की संभावना
मशरूम की खेती से होने वाली कमाई काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि उत्पाद को कितनी आसानी से बेचा जा सकता है। जम्मू में होटल, रेस्तरां, सब्जी विक्रेता और घरेलू उपभोक्ता इसके संभावित खरीदार हो सकते हैं। इसलिए उत्पादन शुरू करने से पहले आसपास के बाजार में मांग, बिक्री मूल्य और प्रतिस्पर्धा की जानकारी जुटाना जरूरी है।
मशरूम को ताजा बेचने के अलावा उचित तकनीक से सुखाकर या अन्य खाद्य उत्पाद तैयार करके भी बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए भंडारण, पैकेजिंग, स्वच्छता और उत्पाद की गुणवत्ता का ध्यान रखना आवश्यक है।
खेती में उपलब्ध कृषि अवशेषों, जैसे भूसे आदि का उपयोग भी कुछ किस्मों के उत्पादन में किया जा सकता है। इससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है। फिर भी वास्तविक लागत मशरूम की किस्म, कच्चे माल, उपकरणों, बिजली, श्रम और उत्पादन व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
स्पान उत्पादन की तकनीक पर रहेगा विशेष जोर
स्कास्ट-जम्मू के मशरूम अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र में आयोजित होने वाले तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों को मशरूम उत्पादन की वैज्ञानिक जानकारी और व्यावहारिक कौशल प्रदान करना है।
प्रशिक्षण के दौरान बटन, आयस्टर और विशेष किस्मों की मशरूम के स्पान उत्पादन से संबंधित तकनीकों की जानकारी दी जाएगी। स्पान वह बीज सामग्री होती है, जिसकी मदद से मशरूम का उत्पादन किया जाता है। इसकी गुणवत्ता का मशरूम की वृद्धि और उत्पादन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक प्रतिभागियों को शुद्ध कल्चर तैयार करने और उसके रखरखाव, कल्चर की पहचान, मदर स्पान बनाने तथा विभिन्न सब्सट्रेट यानी उत्पादन माध्यमों के चयन की प्रक्रिया समझाएंगे। इसके साथ ही सब्सट्रेट की नसबंदी, स्वच्छ वातावरण में काम करने की तकनीक और स्पान तैयार करने के विभिन्न चरणों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।
गुणवत्ता जांच और उत्पादन संबंधी समस्याओं की मिलेगी जानकारी
प्रशिक्षण में केवल मशरूम उत्पादन की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि स्पान की गुणवत्ता जांचने और उसे उचित तरीके से संग्रहित करने से जुड़ी जानकारी भी दी जाएगी। इसके अलावा उत्पादन के दौरान आने वाली समस्याओं, संदूषण से बचाव और उससे निपटने के तरीकों पर भी चर्चा होगी।
मशरूम उत्पादन में स्वच्छता और सही तकनीक का विशेष महत्व होता है। यदि उत्पादन माध्यम या स्पान दूषित हो जाए, तो पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। ऐसे में वैज्ञानिक तरीके से प्रशिक्षण प्राप्त करना नए उद्यमियों के लिए उपयोगी हो सकता है।
किसानों, विद्यार्थियों और युवाओं के लिए अवसर
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसान, विद्यार्थी, ग्रामीण युवा, छोटे उद्यमी, स्वयं सहायता समूहों के सदस्य, किसान उत्पादक संगठनों से जुड़े लोग और मशरूम उत्पादन में रुचि रखने वाले अन्य इच्छुक व्यक्ति भाग ले सकते हैं।
कार्यक्रम के लिए प्रति प्रतिभागी प्रशिक्षण शुल्क 2,500 रुपये निर्धारित किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसमें केवल 10 सीटें रखी गई हैं। इसलिए इच्छुक लोगों को पहले से पंजीकरण करवाना अनिवार्य होगा। पंजीकरण की प्रक्रिया, आवश्यक दस्तावेजों और अन्य शर्तों की जानकारी के लिए संबंधित विश्वविद्यालय या मशरूम अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र से संपर्क करना उचित रहेगा।
निवेश से पहले इन बातों का रखें ध्यान
मशरूम की खेती शुरू करने के इच्छुक लोगों को सबसे पहले अपने क्षेत्र के बाजार और संभावित खरीदारों की जानकारी जुटानी चाहिए। इसके बाद उपयुक्त किस्म, उत्पादन के लिए जरूरी जगह, तापमान नियंत्रण, कच्चे माल, बिजली, श्रम, पैकेजिंग और परिवहन पर होने वाले खर्च का अनुमान तैयार करना चाहिए।
शुरुआत में बड़े स्तर पर निवेश करने के बजाय छोटे बैच से उत्पादन शुरू करना अधिक व्यावहारिक हो सकता है। इससे उत्पादन प्रक्रिया को समझने, बाजार की प्रतिक्रिया जानने और संभावित नुकसान को सीमित रखने में मदद मिल सकती है।
मशरूम उत्पादन किसानों और बेरोजगार युवाओं के लिए स्वरोजगार का एक उपयोगी विकल्प बन सकता है, लेकिन इसमें निश्चित कमाई की गारंटी नहीं है। उचित प्रशिक्षण, वैज्ञानिक तकनीक, गुणवत्ता नियंत्रण और बिक्री की प्रभावी व्यवस्था के साथ ही इस व्यवसाय को लंबे समय तक सफलतापूर्वक चलाने की संभावना बढ़ सकती है।
स्कास्ट-जम्मू का प्रस्तावित प्रशिक्षण कार्यक्रम इसी दिशा में इच्छुक लोगों को तकनीकी जानकारी देने और उन्हें मशरूम उत्पादन से जुड़े स्वरोजगार तथा उद्यमिता के अवसरों के लिए तैयार करने की पहल है।


