JNM पत्रकार हरदीप जम्वाल, जम्मू
जम्मू के नरवाल इलाके में रोहिंग्या बस्तियों के खिलाफ प्रशासन की कार्रवाई तेज हो गई है। जमीन मालिकों को जारी किए गए नोटिस के बाद नरवाल में कई अस्थायी ढांचों को हटाने का सिलसिला शुरू हो गया है। मंगलवार से शुरू हुई कार्रवाई बुधवार को भी जारी रही। कई जगहों पर झुग्गियों में रहने वाले लोगों ने अपने स्तर पर अस्थायी ढांचे हटाए और सामान बाहर निकाला।
प्रशासन की कार्रवाई केवल नरवाल तक सीमित नहीं बताई जा रही है। जम्मू के अलग-अलग इलाकों में रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों के रहने वाले ठिकानों की पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया भी चल रही है। कई मामलों में निजी जमीन मालिकों को नोटिस जारी किए गए हैं, जिसके बाद मकान, दुकान और अन्य जगहों पर रह रहे लोगों को परिसर खाली करने के लिए कहा गया है।
दिल्ली से आई उच्चस्तरीय समिति ने नरवाल का लिया था जायजा
इस कार्रवाई के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी केंद्र सरकार की ओर से गठित जनसांख्यिकीय बदलाव पर उच्चस्तरीय समिति का जम्मू दौरा है। अगस्त में समिति जम्मू पहुंची थी और नरवाल इलाके में रोहिंग्याओं की बस्ती का मौके पर जाकर जायजा लिया था। समिति ने प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा अलग-अलग प्रतिनिधिमंडलों से भी बातचीत की थी।
समिति का दौरा जम्मू-कश्मीर में जनसांख्यिकीय बदलाव, अवैध प्रवासन और संबंधित प्रशासनिक व्यवस्थाओं की पड़ताल के व्यापक अभ्यास का हिस्सा था। नरवाल में मौके की स्थिति देखने के बाद अब प्रशासन की ओर से कार्रवाई सामने आने से इस पूरे मामले को लेकर चर्चा और तेज हो गई है।
जम्मू संभाग में 6,737 रोहिंग्या
सरकारी स्तर पर सामने रखे गए आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में कुल 7,656 रोहिंग्या चिन्हित किए गए हैं। इनमें जम्मू संभाग के 10 जिलों में 6,737 और कश्मीर संभाग के 10 जिलों में 919 रोहिंग्या बताए गए हैं।
यानी उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक जम्मू संभाग में चिन्हित रोहिंग्याओं की संख्या कश्मीर संभाग के मुकाबले काफी अधिक है। यही वजह है कि जम्मू क्षेत्र में उनकी मौजूदगी और संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है।
राजनीतिक दलों के बीच भी मुद्दे पर अलग-अलग रुख
रोहिंग्याओं की मौजूदगी का मुद्दा जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नया नहीं है। भारतीय जनता पार्टी लगातार इस मुद्दे को सुरक्षा, अवैध प्रवासन और जम्मू की जनसांख्यिकी से जोड़कर उठाती रही है। भाजपा नेताओं की ओर से रोहिंग्याओं और बांग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी की जांच तथा उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की जाती रही है।
दूसरी तरफ, विपक्षी दलों और मानवाधिकार से जुड़े पक्षों की ओर से इस मामले में कानूनी प्रक्रिया और मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखने की बात कही जाती रही है। ऐसे में राजनीतिक बहस मुख्य रूप से इस बात पर है कि रोहिंग्याओं की पहचान और सत्यापन किस प्रक्रिया से हो, अवैध रूप से रह रहे लोगों के खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई हो और सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को किस तरह देखा जाए।
पहले भी हो चुकी है कार्रवाई
जम्मू में रोहिंग्याओं की मौजूदगी को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई पहले भी हो चुकी है। वर्ष 2021 में जम्मू शहर में सत्यापन अभियान के दौरान बड़ी संख्या में रोहिंग्याओं की पहचान की गई थी। इसके बाद कई लोगों को कठुआ जिले के हीरानगर स्थित होल्डिंग सेंटर में रखा गया था।
अब करीब पांच साल बाद एक बार फिर रोहिंग्या बस्तियां प्रशासन की कार्रवाई के केंद्र में हैं। इस बार कार्रवाई ऐसे समय में हो रही है जब केंद्र की उच्चस्तरीय समिति जम्मू में जनसांख्यिकीय स्थिति का मौके पर जायजा लेकर लौट चुकी है।
जमीन मालिकों को नोटिस, अस्थायी ढांचे हटाने की कार्रवाई
नरवाल में मौजूदा कार्रवाई का तत्काल आधार जमीन और वहां बने अस्थायी ढांचे बताए जा रहे हैं। प्रशासन ने संबंधित जमीन मालिकों को नोटिस जारी किए हैं और उनके प्लॉट पर बने अस्थायी ढांचे हटाने को कहा गया है। नोटिस के बाद कई जगहों पर झुग्गियां और टिन के अस्थायी ढांचे हटते दिखाई दिए।
प्रशासन की इस कार्रवाई के साथ अब यह मामला जम्मू में सुरक्षा, भूमि उपयोग, विदेशी नागरिकों के सत्यापन और जनसांख्यिकीय बदलाव से जुड़े सवालों के केंद्र में आ गया है।
फिलहाल नरवाल में कार्रवाई जारी है और आने वाले दिनों में जम्मू के अन्य इलाकों में भी प्रशासन की ओर से इसी तरह की कार्रवाई आगे बढ़ती है या नहीं, इस पर नजर बनी हुई है।



