Monday, July 27, 2026
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विदेशी अखरोटों के आगे फीका पड़ा कश्मीर का ‘सोन अखरोट’ — प्रसंस्करण ठप, किसान बेहाल

JNM संवाददाता, श्रीनगर
हरदीप जमवाल

कभी कश्मीर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे अखरोट अब अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। सस्ते विदेशी अखरोटों की बाढ़, प्रसंस्करण की कमी और स्थायी बाजारों के अभाव ने इस परंपरागत उद्योग को झटका दिया है। किसान और व्यापारी दोनों सरकार से राहत की आस लगाए बैठे हैं।

शोपियां के किसान अब्दुल गनी डार बताते हैं — “हमारे अखरोट पूरी तरह जैविक हैं, लेकिन कैलिफोर्निया, चीन और चिली से आने वाले सस्ते अखरोटों के आगे टिक नहीं पा रहे। बाहर के अखरोट पैकिंग में बेहतर और दाम में सस्ते हैं।”


बिक्री पर बिचौलियों का कब्जा

बडगाम के किसान गुलाम नबी लोन का कहना है कि किसानों के पास न तो स्थायी मंडी है और न ही ग्रेडिंग की सुविधा। “फसल तैयार होने के बाद हमें आढ़तियों को बेचना पड़ता है, जो बाहर ले जाकर मनमाने दाम तय करते हैं।”
किसानों की यह मजबूरी पूरे क्षेत्र में आम है — उत्पादन अच्छा होने के बावजूद बिक्री व्यवस्था बिखरी हुई है।


उद्योग ठप, राहत की उम्मीद अधूरी

कश्मीर ड्राई फ्रूट संघ के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद यूसुफ़ खान बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में कई प्रसंस्करण इकाइयां बंद हो चुकी हैं। “जीएसटी ने भी हमारे कारोबार पर बोझ बढ़ा दिया है। हमारी मांग है कि अखरोट को जीएसटी से मुक्त किया जाए ताकि किसानों और छोटे व्यापारियों को राहत मिल सके।”


खरीदारों का रुख विदेशी बाजार की ओर

जम्मू की हरी मार्केट में पिछले सात साल से ड्राई फ्रूट का कारोबार कर रहे अमनदीप सिंह कहते हैं, “इस समय कश्मीरी अखरोट 450 रुपये किलो बिक रहा है, जबकि कैलिफोर्निया का 600 और चिली का 900 रुपये किलो है।”
उनके मुताबिक चिली का अखरोट स्वाद और गुणवत्ता में श्रेष्ठ है, लेकिन महंगा होने के कारण कम बिकता है। “कैलिफोर्निया वाला सस्ता भी है और उसके दाने भी अच्छे होते हैं, इसलिए ग्राहक अब उसी की ओर झुक रहे हैं।” नतीजा यह है कि कश्मीरी अखरोट की बिक्री साल-दर-साल घट रही है।


विदेशी आयात से स्थानीय कारोबार चरमराया

भारत हर साल लगभग 3.2 लाख मीट्रिक टन अखरोट का उत्पादन करता है, जिसमें जम्मू-कश्मीर की हिस्सेदारी 95% से अधिक है। इसके बावजूद स्थानीय किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
विश्व व्यापार संगठन के आंकड़ों के अनुसार, साल 2023 में भारत ने करीब 57 हजार टन विदेशी अखरोट आयात किए, जिनकी कीमत करीब 660 करोड़ रुपये रही।
सबसे अधिक आयात चिली (49 हजार टन) और अमेरिका (6 हजार टन) से हुआ। तुलना करें तो 2021 में यह आंकड़ा 37 हजार टन था — यानी सिर्फ दो साल में विदेशी अखरोट आयात में 50% से अधिक वृद्धि हुई।


गुणवत्ता बरकरार, बाजार में पहचान धुंधली

कश्मीर में अखरोट की खेती से करीब 7 लाख लोग सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े हैं। लगभग 89 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती की जाती है।
यहां की तीन प्रमुख किस्में — वुंथ (तेल निकालने योग्य), कागजी (पतले छिलके वाली) और बुरजुल (गहरे रंग की) — अब भी अपनी गुणवत्ता के लिए जानी जाती हैं, लेकिन बाज़ार में इनकी पहचान धीरे-धीरे धुंधली पड़ती जा रही है।

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